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वर्ष: 2, अंक 29, जनवरी(द्वितीय), 2018



ठिठुरती जिंदगी


सपना परिहार




ठिठुरती जिंदगी ,
फुटपाथ पर, मन्दिरों पर,
स्टेशन पर ,
और .....
उन तमाम जगह ,
जो बन जाता है उन यतीमों का 
आशियाना ,,,,,
जो तलाशते है थोड़ा सा सुकून,
थोड़ी सी नींद ,
उस खुले आसमान तले 
जो बना देती है सर्द भरी रातो को 
बर्फ की तरह !
जिसमे गुजारते है वो सभी अपनी रात ,
जिनके पास नर्म मुलायम बिस्तर
और सिर छुपाने को कोई घर नही है।

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