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वर्ष: 2, अंक 29, जनवरी(द्वितीय), 2018



वो रात


रश्मि सुमन



कहाँ छुपा के रखी है
वो रात तूने?
भींगी रुत,
भींगे शब्द !
न जाने कहाँ गुम हैं?
भींगी रात,
भींगी बात !
न जाने कहाँ गुम हैं?
भींगी आहट ,
भींगी गुनगुनाहट !
भींगे-भींगे जज़्बात ,
न जाने कहाँ गुम हैं?

वो रात.......
जब भीगे भीगे से आये थे तुम
उस खुश्क रात के होठों पर बादल रखकर,
हर साँस में एक समंदर लिये
जिसके साहिल दर साहिल मैं डूबी थी
वो रात.....
अब भी कहीं पोशीदा है,
वो रात.
रोज मेरे सिरहाने 
भीगी भीगी सी पडी मिलती है
वो रात.
कहाँ छुपा कर रखी है तूने?


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