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वर्ष: 2, अंक 29, जनवरी(द्वितीय), 2018



लिखके रखता हूँ


नरेश गुर्जर


 

लिखके रखता हूँ डायरी के पन्नों मे जज्बात मेरे
अगर तुम होती साथ तो कह देता तुमसे सारे के सारे

तेरे घर का पता मालूम नही मुझको
भेज देता जो बनाकर खत उनको लिफाफे के सहारे

तेरी गली कभी आया भी तो नही मै
फिर भला कैसे ढूँढ पाता तुमको किसी खिड़की चौबारे

मेरी मोहब्त तो खामोश मोहब्त ठहरी
बस चलती रही मेरे ही दिल के गलियारे

फिर कौन समझाता मुझ पागल को
होता नही दरिया पार खडे़ रहकर किनारे


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