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वर्ष: 2, अंक 29, जनवरी(द्वितीय), 2018



वृक्षों का उपकार


कुलदीप पाण्डेय आजाद


 
 
काट रहे हो तुम वृक्षों को,
कुछ भी नहीं विचार किया।
वृक्षों ने जो कुछ भी पाया,
उसे हमीं पे वार दिया।।
इतना बड़ा हमारा जग है,
क्षरण यहाँ स्वीकार नहीं।
वे भी जीव इसी जग के हैं,
जीना क्या अधिकार नहीं?
फल अरु फूल दिया है इसने,
राही को भी छावं दिया।
वृक्षों ने जो कुछ भी पाया,
उसे हमीं पे वार दिया।।
शिक्षा हमें कहाँ ले जाती,
नैतिक यदि आधार नहीं।
माना युग भी बदल रहा है,
पर इतना अनुदार नहीं।
कितनी भूमि यहाँ उर्वर है,
नैतिकता विश्वास दिया।
वृक्षों ने जो कुछ भी पाया,
उसे हमीं पे वार दिया।।
बिना पेड़ जीवन क्या संभव,
समझ न पाता कोई क्यों?
सूरज की किरणों में तपकर, 
देते छाँव हमें वर्षों।
व्यक्त नहीं कर सकता कोई,
हमपर जो उपकार किया।
वृक्षों ने जो कुछ भी पाया,
उसे हमीं पे वार दिया।।

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