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वर्ष: 2, अंक 29, जनवरी(द्वितीय), 2018



क्रोध


कुलदीप पाण्डेय आजाद


 
 
दया भाव हो सबके मन में,
जिससे बनें उदार सभी।
दिख जाए जिससे राह सही,
क्रोध वहाँ पर बुरा नहीं।।
हम सही राह पहचान सकें,
दिखे किरण अंधियारों में।
जिससे कांटे भी देख सकें,
चलते जब भी हम राहों पे।
जब अंतर मन में चोट लगे,
है दिखती सबको राह तभी।
दिख जाए जिससे राह सही,
क्रोध वहाँ पर बुरा नहीं।।
कभी-कभी तो पैर हमारे,
डिग जाते हैं राहों से।
आँखों में दृश्य हो मंजिल का,
पैर मगर हों राहों पे।
जब गलत राह पर पथिक बढ़े,
क्रोध दिखाता राह सही।
दिख जाए जिससे राह सही,
क्रोध वहाँ पर बुरा नहीं।।

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