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वर्ष: 2, अंक 29, जनवरी(द्वितीय), 2018



अब हद से बाहर हर बात !!


कविता गुप्ता


 

कहीं प्रकृति का प्रकोप, 
'आविष्कारों' से संहार। 
हैं रक्त पिपासे परस्पर, 
'मासूमों' पर अत्याचार।
नारी अपमानित होती, 
मान्यतायों का तिरस्कार। 
हम अपना उजाला भूले, 
दिखे औरों का अंधकार।
दूल्हों की 'बोली' लगती ,
होता दुल्हिन का व्यापार। 
गुण गौण, 'विचौले' खुश हैं,
देखा ! बिखर रहे परिवार।
'मालिक' है मुसीबत में,
क्यों भटक गया संसार ?
मानव में छिपा दानव है ,
गल्ती न करे स्वीकार I
कोई जादू छड़ी घुमाएँ !
शांत हो जाएगा हाहाकार। 
इसकी एक अचूक दवा है , 
हम परखें निज व्यवहार,
हो सकता उत्तम उपचार ?

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