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वर्ष: 2, अंक 29, जनवरी(द्वितीय), 2018



बात


कमलेश यादव


 

जब तुम बात करते हो
मैं कुछ और सुनती हूँ

जब मैं बात करती हुँ
तुम कुछ और सुनते हो

देखो ना बात क्या थी?
और बात क्या हो गयी हैं?

चलो इस बात को यूँ सुलझाते हैं
कुछ बातों को हम भूलते भुलाते हैं

मौन ही करे बात
जब कुछ ना हो कहने को

और जब करे बात तो
वही समझे जो कहा गया हो

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