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वर्ष: 2, अंक 29, जनवरी(द्वितीय), 2018



कैसे लौटे वतन कोई


गौतम कुमार सागर


 

कैसे  लौटे वतन कोई 
यह यात्रा  या रण कोई

रेल में जगह नहीं
बस भी भरी हुई
भारत की आत्मा 
गेट पर लटकी हुई 

सफ़र एक संग्राम है 
सड़क पर जाम है 
सफ़र में बीत गयी 
छुट्टियाँ तमाम है 

विकास की यह वेदना 
आम जन बताएँगे 
रेल की एक बर्थ पे
दस लोग निभाएँगे 

माननियों के लिए 
तो पुष्पक विमान है 
त्योहार के समय में तो 
सफ़र इम्तिहान है 

स्वप्न में चिड़िया  कोई 
विकास गीत  गा रही
रास्ता छोड़ो भी अब 
बुलेट ट्रेन आ रही

मवेशियों के जैसे लोग
लदे फदे वाहनों में 
आँखे देख रही रास्ता 
लीपे पुते आँगनों में 

बहरुपिये हैं गा रहे 
चुनाव का कीर्तन कोई 
कैसे  लौटे वतन कोई 
यह यात्रा  या रण कोई

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