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वर्ष: 2, अंक 29, जनवरी(द्वितीय), 2018



तेरे बिन कुछ नहीं


डॉ दिग्विजय शर्मा "द्रोण"


 

तेरे बिन ये जीवन और जहान कुछ नहीं 
ये तन मन और ये सदन, धन कुछ नहीं।
यूँ तो ख्वाब हजारों हैं इन भीगी आखों में
जिसमें तू न हो, वो  ख्वाब स्वप्न कुछ नहीं।
इक तेरा स्पर्श ही, मुझको दिन रात भाता है
जिसे न छु सका, वो तन और कुछ नहीं।
चाहे हों उपवन, कितने भी फिर जंगल यहाँ 
जिसमें प्रेम पुष्प न हो, वो वन कुछ नहीं।
मिल जाएँगी यहाँ,  तुझे सब ओर बहारें 
जहाँ तू न खिल सके, वो वन कुछ नहीं।
गर्म साँसों में मेरी, इक तेरी ही महक है
जिसमें तू नहीं चले, वो बदन कुछ नहीं।
कर ले भले ही तू, कितनी भी कोई सजावट
जहाँ में न हूँ,  वो दिल की  धड़कन कुछ नहीं।
दिल धड़कता है मेरा, बस तेरा ही नाम ले लेकर
तेरे बिना खनकते, ये घुँगरू कंगन कुछ नहीं।
इस दिल में ऐ सनम,  बस तू ही है बसी हुई
तेरे नाम के बिना, मेरी धङकन कुछ नहीं।
तुझसे ही दिवस है,  तुझसे ही है मेरी रातें
तेरे बिन ये काली रात, अन्धकार है कुछ नहीं।
तू ही है मेरी चाँदनी, तू ही तो मेरा चाँद है 
तेरे बिना मेरा जहाँ, ये रौशन भी कुछ नहीं।
इस जहाँ में चाहे हैं मिले, जाने कितने रिश्ते मुझे
मैं तेरा न यहाँ गर हो सका, वो रिस्ता कुछ नहीं।
मैं क्यों न  रात दिन, अब याद कर लू श्याम को
देख  ना लूँ तुझे, जब तक वो दिन भी निकलता नहीं।

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