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वर्ष: 2, अंक 29, जनवरी(द्वितीय), 2018



चुपचाप


अर्विना गहलोत


  

चुपचाप समुन्दर में लहरों की हलचल है ।
बैखौफ हवाओं में पत्तों की हलचल है।

गाँव की पकडंडी पर संन्नाटे चुपचाप खड़े।
शायद कोई शहरी कब मुड़े आ जाये।

चुपचाप पहाड़ों में लावे की हलचल है ।
धरती के तल में कम्पन की हलचल है ।

चुपचाप  खामोशी में दिल की धड़कन  है।
मेरे जीवन में सुख दुख की हलचल है।


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