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वर्ष: 2, अंक 29, जनवरी(द्वितीय), 2018



आज तक


अर्विना गहलोत


  

रात सोई हम जागे आज तक।
ग़मजदा थे हम आज तक।

तुम्हारी बेवफाई से बेजार ।
इतने ना समझ भी न थे तुम ।

ये जाना ही नहीं तुमने हम ।
कितने परेशान थे आज तक।

मेरी परेशानी का सबब तुम थे।
न जाने तुम कहां गुम थे आज तक।

लोट कर आओ तो सही ।
इंतज़ार में उम्मीद लगाए बैठे हैं।

ना उम्मीद नहीं है आज तक ।
किसीने कहा उम्मीद पे दुनिया कायम है

उसी उम्मीद का दामन थामें बैठे हैं आजतक।
कसम खुदा की तुम न आए मिट ही जाएगे


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