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वर्ष: 2, अंक 29, जनवरी(द्वितीय), 2018



प्रेम की कोकिला


डॉ० अनिल चड्डा


 
आँख मिली न थी 
कि झट से झपका ली
चुनरी हया की 
सिर पे सरका ली
बात-बे-बात
अपनी अँगुली चटका ली
जानी-अनजानी राहों पे
नज़र भटका ली
प्रीत की छाँव में 
अंगनिया महका ली 
किसी की सोच में 
सोच अटका ली
और फिर सोचती हो
खुद को पता भी न चले
कि कब
तुम्हारे दिल ने 
प्रेम की कोकिला
चहका ली!
 

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