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वर्ष: 2, अंक 29, जनवरी(द्वितीय), 2018



जब नियति परीक्षा लेती है।


अमरेश सिंह भदोरिया


 
जब नियति परीक्षा लेती है।
वह कठिन यातना देती है।
1.
विघ्न और बाधा सहकर, पुरुषार्थ थके कुछ रह-रहकर, सर्वस्व न्योछावर होने पर, मरघट मे जाकर सोने पर, सत्य-धर्म के पालन की, मुश्किलें कहाँ कम होती है।
2.
रिश्तों में जहाँ दिखे स्वारथ, होती हर रोज महाभारत, अज्ञातवास की लिए घुटन, पांडव विचरण करते वन-वन, अपमान घूँट पीकर पांचाली, अश्रुओं से नयन भिगोती है।
3.
डरा-डरा हर पात दिखे, सहमी-सहमी सी प्रात दिखे, जब दिनकर भी लाचार दिखे, बदला सब कारोबार दिखे, कहना मुश्किल हो जाता है, क्या सुबह भी ऐसी होती है।
4.
कलम चले यूँ झुक-झुककर, सत्य लिखे कुछ रुक-रुककर, फिर भाग्य मनुजता का फूटे, किश्ती जब नाविक खुद लूटे, कुनबा पूरा ढह जाता है, यूँ परिधि विखंडित होती है।
5.
वायस और शृगाल सभी, मिल करते खूब धमाल सभी, टुकड़ों में उपवन बट जाता, मनचाहा हिस्सा छंट जाता, रह जाता हंस हाथ मलकर, जब किस्मत खोटी होती है।

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