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वर्ष: 2, अंक 29,  जनवरी(द्वितीय), 2018



उपहार


डा० अनिल चड्डा


उस दिन जब तक हमारे नए मकान में शिफ्ट होने की प्रक्रिया समाप्त हुई तो शाम का झुरमुट उतर आया था । नई जगह, अनजाने लोग और उस पर सर्दियों की शाम । इस लिये ज्यादा ही सुनसान लग रहा था । यूँ तो जगह के नाम पर कोई लम्बा-चौड़ा मकान नहीं था । बस एक कमरा और रसोई । पिछवाड़े छोटा सा दालान और घर के सामने पार्क । पार्क और घर के बीच एक छोटी सी सड़क थी । पार्क के तीनों ओर ऐसे ही फलैट बने हुए थे । लगा था कि दिल्ली के बीचों-बीच की चिल्ल-पौं से छुटकारा मिल गया । बहुत शांति सी लग रही थी चारों ओर । सोचा, चलो यहाँ लेखनी खूब चलेगी ।

शिफ्टिंग के चक्कर में थक कर चूर हो गया था । हालाँकि शाम का झुरमुट घिर आया था और घर के अंदर भी हल्का-हल्का अँधेरा हो रहा था, रोशनी का इन्तजाम करने को मन नहीं हो रहा था । बस, यूँ ही चारपाई डाल उस पर पड़ गया । अभी सोच ही रहा था कि पत्नी को चाय के लिये आवाज लगाऊँ, वह बदहवास सी भागती हुई मेरे ऊपर आ कर गिरी । गले से आवाज नहीं निकल रही थी । बस पीछे की तरफ इशारा करते हुए बार-बार हकला कर बोल रही थी –

“व … व … वहाँ …”

“क्या है वहाँ?” मैंने प्यार से पूछा तो भी वह संभल नहीं पाई और वैसे ही हकला कर बोली –

“व …व …व …हाँ … कोई…”

“क्या वहाँ-वहाँ लगा रखी है? ढ़ंग से क्यों नहीं बताती ?”

शायद मेरे झिड़कने से उसका मानसिक संतुलन कुछ ठीक हुआ । अपने ऊपर काबू करते हुए बोली –

“ वहाँ पीछे कोई घुस आया है ।“

“ चलो, मैं चल कर देखता हूँ ।“

पिछले दरवाजे पर, जो कि खुला ही रह गया था, एक पन्द्रह-सोलह साल का भारी शरीर का लड़का खड़ा था । मेरे पहुँचते ही वह खो-खो करता हुआ भाग लिया । लगा कि यह मुहल्ला कुछ खास अच्छा नहीं है । जल्दी ही यहाँ से कूच करना पड़ेगा । यूँ तो मेरी पत्नी कुछ खास सुन्दर नहीं है परन्तु शारीरिक बनावट कुछ ऐसी है कि कोई भी देख कर एक बार तो ठिठक ही जायेगा । वैसे भी हिन्दुस्तान के यौवन की मानसिकता को सेक्स-रूपी कीड़ा कुछ जल्दी ही लग जाता है और इसका कुछ इलाज भी नहीं है । शादी को अभी दो साल भी नहीं गुजरे थे । पत्नी की उम्र भी ऐसी ही थी कि जिसमें हर स्त्री वैसे भी आकर्षक लगती है ।

इस घटना से मेरी पत्नी तो इतनी डर गई थी कि दिन में भी दरवाजे बंद करके बैठने लगी । परन्तु जैसे-जैसे समय व्यतीत होता गया, उसका मनोबल ठीक होता गया । वैसे तो उसकी प्रवृति अपने में ही सीमित रहने की है, परन्तु यदि कोई घर आये तो उसकी आवभगत में कोई कसर नहीं छोड़ती । उसके इस व्यवहार से जो पड़ौसिनें पहले उसे घमंडी की संज्ञा देती थीं, अब धीरे-धीरे उससे घुलने-मिलने लगी थीं । एक महीने के अंदर-अंदर उसकी लगभग सभी से जान-पहचान हो गई थी । परन्तु पहले दिन की घटना ने अभी भी उसके मन में कोई ग्रन्थि बना रखी थी, जिससे वह बाहर कम ही निकलती थी । सिर्फ आवश्यकता पड़ने पर ही उसका बाहर निकलना हो पाता था ।

परन्तु एक दिन यह ग्रन्थि भी खुल ही गई । उस दिन शाम को जब मैं काम से लौटा तो वो पश्चाताप के स्वर में बोली –

“सुनिये, आपको वह पहले दिन वाली घटना याद है?”

“कौन सी?” दर-असल काम की अधिकता के कारण वह घटना मेरे मन से उतर चुकी थी ।

“अरे वही, जब मैं पीछे एक लड़के को देख कर डर गई थी ।“

“हाँ, हाँ । अब क्या हुआ ?” किसी असंभावित घटना की सोच कर मेरे कान खड़े हो गये ।

“अरे कुछ नहीं ! मुझे तो आज ही मालूम पड़ा कि वह लड़का बचपन से ही दिमागी तौर पर कमजोर है । बेचारा, ढंग से बोल भी नहीं पाता । पढ़ना-लिखना और समझना तो दूर की बात है ।“

“अच्छा !” मेरा मन उसके लिये सहानुभूति से भर आया ।

“हाँ, और यह भी आज ही पता चला है । दोपहर में एक पड़ौसिन, जो यहाँ से सात-आठ घर दूर रहती है, मुझ से मिलने आई । उन्हें अभी बैठे पाँच मिनट ही हुए थे कि वही लड़का उनको ढूँढ़ता हुआ घर में घुस आया । मैं तो मन ही मन बहुत डर गई थी । परन्तु वह अंदर आ कर उस महिला, जो उसकी माँ है, की गोद में सिर रख कर तोतली जबान में बोला ‘अम्माँ, भूथ लदी है’ ।उस महिला ने फिर रोते हुए बताया कि वह बेचारा बचपन से ही ऐसा है ।“

“ओह !”

“सच, मुझे तो उस बेचारे पर बड़ा ही तरस आया । उस दिन मैं क्या समझ बैठी थी उसे अनजाने में ।“

मुझे भी यह सुन कर शर्मिन्दगी महसूस हुई । क़ुदरत के रंग भी न्यारे होते हैं । उससे भी ज्यादा मुझे उसकी माँ से सहानुभूति हुई जो अपनी इकलौती सन्तान का भार न जाने कैसे ममता के हाथों मजबूर हो कर ढो रही थी ।

पहले दिन की घटना से मेरे मन में जो संशय उत्पन्न हो गया था, वह यकायक ही मिट गया । मेरी पत्नी भी अब पहले जैसे नहीं रही थी । सबसे घुल-मिल कर रहने लगी थी । और खास कर उस महिला के यहाँ उसका ज्यादा ही समय व्यतीत होने लगा था । शायद वह अपने पहले दिन वाले व्यवहार से कुछ ज्यादा ही ग्लानि महसूस कर रही थी ।

वैसे भी हमारी शादी को लगभग ढाई वर्ष होने को आये थे । परन्तु अभी तक हमारे आँगन में किलकारी नहीं गूँजी थी । नौकरी की वजह से मैं तो अपना ध्यान बंटा लेता था, परन्तु पत्नी बेचारी क्या करती खाली समय में । उस लड़के पर कुछ क़ुदरत के प्रकोप से उत्पन्न हुई सहानुभूति ने, कुछ पहले दिन होने वाली घटना की शर्मिन्दगी ने और कुछ ममता की माँग ने पत्नी के मन से सारे संशय मिटा दिये थे । अब तो उसका सारा समय या तो पड़ौसिनों के साथ गप्प लगाने में निकलता था या उस लड़के के नखरे उठाने में । अब उसके घर में आने-जाने पर कोई पाबन्दी नहीं थी । बेधड़क आने-जाने लगा था ।

एक दिन शाम को जब मैं काम से लौटा तो पत्नी को अँधेरे में औंधे-मुँह बिस्तर पर पड़ा हुआ पाया । मैंने सोचा तबीयत ठीक नहीं होगी । पूछा तो मुझ से लिपट कर वह फूट-फूट कर रोने लगी । और बार-बार यही कहती रही कि यहाँ से जल्दी ही मकान बदल लो । अब यहाँ नहीं रहना है । मेरे लाख पूछने पर भी कुछ नहीं बताया तो तंग आ कर मैंने हाँ कर दी । वह चुपचाप बिस्तर से उठी, मुझे खाना परोसा और स्वयँ बिन खाये ही बिस्तर पर लेट गई । सोचा, किसी बात पर मन खिन्न हो गया होगा या किसी पड़ौसिन से तकरार हो गई होगी जो मन को लगा बैठी है ।

धीरे-धीरे उसमें बदलाव आते हुए पाया मैंने । अब वह पहले जैसे ही हो गई थी । किसी से भी मिलना-जुलना छोड़ दिया था । बस, दरवाजा बंद किये पड़ी रहती थी । उस लड़के का आना-जाना भी बंद हो गया था । वक्त-बेवक्त एक ही रट लगाये रखती थी –“मकान बदल लो जल्दी से, अब नहीं रहना यहाँ ।“ उसकी जिद से तंग आकर मैंने एक महीने के अंदर ही दूसरा मकान देख लिया और उस मुहल्ले को अलविदा कह दिया ।

नये मकान में आते ही मुझ शुभ-सूचना मिली कि मैं बाप बनने वाला हूँ । मन ही मन मैंने भगवान को धन्यवाद दिया कि चार बरस बाद अब घर में बच्चे की किलकारी गूँजेगी । नया घर बड़ा भाग्यशाली लगा । पत्नी में भी समय के साथ सहजता आ गई ।

कुछ समय बाद पुत्र-रत्न का आगमन हुआ । परन्तु उसके गोरे रंग को देख कर मैं बहुत हैरान था । मैं तो तवे की तरह काला और पत्नी साँवले रंग की । न मेरे घर में किसी का रंग गोरा था न ही उसके घर में । धीरे-धीरे सारा माजरा मेरी समझ में आ गया । मेरा पुत्र अब पन्द्रह बरस का होने को है और उसमें उस लड़के की झलक साफ-साफ दिखाई देती है । परन्तु वह बुद्धि का इतना तीक्ष्ण है कि लोग दांतों तले अंगुलि दबा लेते हैं ।

उसके बाद हमें कोई संतान भी नहीं हुई । पत्नी ने मुझे कुछ नहीं बताया । सब कुछ समझते हुए भी मैंने उससे कभी कुछ पूछा नहीं । इसमें न तो उसका और न ही उस लड़के का दोष था । मस्तिष्क से कमजोर होते हुए भी उसमें प्रकृति ने उसमें एक स्वाभाविक इच्छा बख्शी थी और शायद अपनी कमजोरी के चलते ही उसने एक ऐसी हरकत कर दी जो मेरे लिये उपहार साबित हुई । परिस्थितियों ने मुझे एक ऐसा उपहार दे दिया जिसे मैं न कभी पूरे मन से स्वीकार कर पाया और न ही अस्वीकार । शायद ऐसे ही जीवन कट जायेगा ।


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