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वर्ष: 2, अंक 29, जनवरी(द्वितीय), 2018



जीने का हुनर आयेगा


सुभाष पाठक 'ज़िया'



  ज़ब्त कर ग़म को कि जीने का हुनर आयेगा,
  बाद पतझड के बहारों का  सफ़र  आयेगा।
       
  राह सहरा की  चला है तो ये  भी सुन ले  तू,
  सोचना  छोड़  दे  रस्ते  में  शजर  आयेगा।
       
  इतना ख़ुश भी न हो तूफ़ान गुज़र जाने पर,
  ये समुन्दर है यहां फिर  से  भंवर  आयेगा।
       
  जिस पे हर सिम्त से ही आते रहे हों पत्थर,
  कैसे उस पेड़ पे फिर कोई  समर  आयेगा।
       
  आइना होना  ही  काफ़ी  नहीं  है  कमरे  में,
  साफ़ होगा वो तभी  अक्स  नज़र  आयेगा।
       
  ले के इमदाद का  झूठा  सा  बहाना  कोई,
  मुझको औक़ात बताने  वो  इधर  आयेगा।
       
  अपने आगोश में ले लूंगा 'ज़िया' मैं  उसको
  रात को चांद जो दरिया में उतर आयेगा।
      
                    

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