Sahityasudha view
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
मुखपृष्ठ


साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 2, अंक 29, जनवरी(द्वितीय), 2018



कोहरे की रज़ाई से झाँकता सूरज


बृज राज किशोर 'राहगीर'


 
           
कोहरे की  रज़ाई से झाँकता सूरज,
ठंड से राहत ज़रा सी माँगता सूरज।

आजकल वो  देर से घर से निकलता है,
शाम को भी जल्द ही घर भागता सूरज।

धूप से भी दोस्ती कुछ कम हुई शायद,
दोपहर  में  ऊँघता  सा  जागता सूरज।

चाहते  हैं  लोग  सूरज  कुछ सहारा दे,
किन्तु खुद ही हौंसलों से हारता सूरज।

सामने  तीखी  हवाओं  का धनुष हो जब,
देखकर यह शस्त्र थर थर काँपता सूरज।

आग  उगलेगा कभी  यह बेरहम  बनकर,
इन दिनों तो वक़्त अपना काटता सूरज।

कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें