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वर्ष: 2, अंक 28, जनवरी(प्रथम), 2018



नवगीत
आस्थाओं का निमन्त्रण


बृज राज किशोर 'राहगीर'


 

मिल रहा है
आस्थाओं का निमन्त्रण।
मुक्त लेकिन
हो नहीं पा रहा है मन।

देह में अब तक
जगत ही डोलता है;
कामनाओं का 
पिटारा खोलता है;

वासनाओं का 
न हो पाया विसर्जन।

इस ह्रदय को
प्रेम से तो भर न पाया;
ज़िन्दगी भर 
बस रिवाजों को निभाया;

पाँव में डाले रहा
परिवार बंधन।

एक झटके में
सभी कुछ तोड़ना है;
देह की इस 
जेल को ही छोड़ना है;

प्राण ही हैं
जो मुझे देंगे समर्थन।

इस गगन के 
पार जाने की ललक है;
जो वहाँ है
कुछ अधूरी सी झलक है;

वह सहारा दे
तभी तो पाऊँ दर्शन।

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