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वर्ष: 2, अंक 28, जनवरी(प्रथम), 2018



बेवजह कुछ तुक मिलाना


बृज राज किशोर 'राहगीर'


 
बेवजह कुछ तुक मिलाना, और बस।
है उसे शायर कहाना, और बस।

बात में तो  बात  कुछ  है  ही  नहीं;
बात बेमतलब   बनाना, और बस।

कुछ यहाँ से, कुछ वहाँ से ले लिया;
तोड़ना, फिर जोड़ लाना, और बस।

एक मिसरा, दूसरा, फिर  तीसरा;
इस तरह  गिनती बढ़ाना, और बस।

शायरी के नाम  पर  ही  चल  पड़ा;
चुटकुले, किस्से  सुनाना, और बस।

देखकर 'बृजराज' तो हैरान  है;
महफ़िलों में भाव खाना, और बस।

छोड़िए, अब तो  चला  जाये  वहाँ;
हो  जहाँ  पीना पिलाना, और बस।

शायरी  की  है  तलब  तो जाइये;
ढूँढिए ग़म का ख़ज़ाना, और बस।

दर्द  की  दहलीज़  के उस  पार है;
एक  दुनिया  शायराना, और बस।

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