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वर्ष: 2, अंक 27, दिसम्बर(द्वितीय), 2017



व्यंग कविता -
शाम ढ़ले मधुशाला


अमरेश सिंह भदोरिया


 
सुबह-सुबह मंदिर में दर्शन 
शाम ढले मधुशाला ,........
तन-से बगुला वरन बने 
मन-कौवे-से भी काला,.....
.
आदर्शों में पूँज रहे ..........
गाँधी जी की तस्वीरें .........
मौका मिलने पर करते,......
घोटाले में घोटाला,.............
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हमको भी अपना कहते.....
तुमको भी अपना कहते,....
सबसे जोड़ रहें हैँ रिश्ता.....
रोटी-बोटी वाला,...............
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गाँव-गाँव में गली-गली में....
घर-घर जाकर कहते,.........
मैंने भी हांथो में थामी.........
लोकतंत्र की माला,............
.
सपथ-सत्य की खाते .........
लेकर मन-में सेवा भाव,......
अपनी हर चालों में चलते....
पाशा-शकुनी वाला,............
.
अपने चारों ओर लगे हैं.......
प्रहरी वर्दी-वाले,................
पर खुद को कहते ............
मैं हूँ तेरा-रखवाला,...........
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मौसम का अनुमान लगाते..
वो पुरवाई के रुख पर,.......
सपनोँ की फूली फुलवारी में
"अमरेश" गिरा कब पाला ...।

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