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वर्ष: 2, अंक 27, दिसम्बर(द्वितीय), 2017



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कमला घटाऔरा


बीजी अपने दो बेटे और बहुओं तथा बेटी - जमाई के साथ एक बड़े घर में रह रहे थे।बड़ा घर जो बीजी और बाऊ जी की रात दिन की कड़ी मेहनत का नतीजा था। बाऊ जी को गुजरे कुछ ही महीने हुए थे कि बीजी के कानों में कभी कभी बच्चों की खुसर फुसर पड़ जाती तो वे बेचैन हो जाती ।पता नहीं ये क्या स्कीम बना रहें हैं।

एक दिन अचानक बेटी ने आकर माँ से कह ही दिया ,”बीजी ,हम सब चाहते हैं कि यह घर बेच कर अपनी पसंद की जगह घर ले कर रहें बच्चों को भी अलग -अलग कमरा चाहिए वे बड़े हो रहे हैं। आप का क्या विचार है ?”

“मेरा नई जगह जा कर रहना कितना मुश्किल होगा इस बारे किसी ने कुछ सोचा ?” पूछा तो बेटी बोली ,” आपने तो घर में ही रहना है। कौन सा काम पर जाना है।”

“मुझे मेरी कम्पनी, मेरा माहौल तो नही मिलेगा दूसरी किसी नई जगह “ बीजी ने शंका जताई , “मैं तो घर में ही कैद हो कर रह जाऊँगी।

“आप और कितना कम्पनी और माहौल चाहें गी आप अब इन सब से सन्यास क्यों नहीं ले लेती ?”

“तेरा कहने का मतलब क्या है मैं दुनिया से सन्यास लेकर कहीं अन्यत्र चली जाऊँ ?”

“मेरा यह मतलब नहीं था बीजी , हम आप के बच्चें हैं जिस के पास आप का जी करे रह सकती हैं। कोई रोकेगा थोड़े आपको।”

“अब मुझे अपनी मर्जी से बेफिक्र हो कर जीना नहीं चाहिए ?” बीजी गुस्से को पी कर बोली ,” मेहमानों की तरह कभी इस घर कभी उस घर डोलती फिरूँ यही चाहती हो तुम ?”

“बुढ़ापे में थोड़ा आराम करें हम तो बस यही चाहते हैं। अबतक आपने हमारे लिए इतना कुछ किया अब हमें मौका दें कुछ करने का।”

“क्यों नहीं ,घर को बेच कर सब अपना हिस्सा ले लो। मुझे कौन सा साथ ले जाना है।तुम सब के लिए ही तो है। ” बीजी बेमन से बोली , तुमको रजिस्ट्री के काग़ज चाहिए ला देती हूँ।लेकिन पहले वसीयत पर भी दृष्टि डाल लेना ”

बीजी ने जब वसीयत की कॉपी दिखाई सब एक दूसरे का मुँह देखते रह गए ।सब के चेहरे उतर गए।बाऊ जी तो यही कहा करते थे दोनों घर बच्चों के नाम कर दियें हैं। हम धोखे में कैसे रह गए ? वे सब आँखों आँखों में आपस में पूछने लगे।

वसीयत में साफ लिखा था ,जब तक बाऊजी या बीजी जीवित हैं वे घर नहीं बेच सकते।

मरने से पूर्व बाऊजी समझा गए थे कि बच्चे अगर घर बेचने की बात कहें तो उन्हें वसीयत पढ़ने को दे देना। तुम्हे कोई तंग नहीं करेगा।

यही हुआ बच्चे वसीयत की कॉपी बीजी को पकड़ा अपने कमरों की ओर चल दिए बिना कुछ कहे ।

बीजी को बाऊजी ने अपनी सूझ -बूझ से बेघर होने से बचा लिया था ।


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