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वर्ष: 2, अंक 27, दिसम्बर(द्वितीय), 2017



वो काली रात


सुशील शर्मा


 
उस काली रात में
हवा में उड़ता जहर
अंधाधुंध भागते पैर
कटे वृक्ष की तरह
गिरते लोग
भीषण ठंड में
सांसों में अंदर
घुलता जहर
हर कोई नीलकंठ
तो नही हो सकता
जो निगल ले
उस हलाहल को
 रोते बिलखते बच्चे
श्मशान बनती
भोपाल की सड़कें
बिखरे शव
और लहराता
एंडरसन
किसी प्रेत की तरह
अट्ठहास लगाता
उड़ गया
हमारे खुद के
पिशाचों की मदद से
पीछे छोड़ गया
कई हज़ार लाशें
आर्तनाद,चीखें
अंधे,बहरे
चमड़ी उधड़े चेहरे
लाखों मासूमों को
जो आज भी 
भुगत रहे हैं
उन क्षणों को
जब एक जहर
उतरा था
भोपाल की सड़कों पर।

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