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वर्ष: 2, अंक 27, दिसम्बर(द्वितीय), 2017



सुनो हे अर्द्धांगिनी


सुशील शर्मा


 
किया है तुमने सब कुछ अर्पित।
तुम्हे पाकर हूँ मैं आज गर्वित।
खुद के अस्तित्व को मिटा कर
किया मन प्राण तन समर्पित।
प्रणय के गीत की तुम मधुर रागनी।
प्रेम की पूजा हो तुम सुनो हे अर्द्धांगिनी।

जिंदगानी का तुम अदब हो।
मुस्कुराने का तुम सबब हो।
खुशियों से भर दिया दामन
मेरे जीवन के तुम्ही रब हो।
हवा के मधुर झोंकों सी पावनी।
मेरे मन में तुम बसी हो सुनो हे अर्द्धांगिनी।

प्रेम से सभी रिश्तों को निभाया 
सबको यथोचित आदर दिलाया 
खुद के अस्तित्व को कर समर्पित।
मेरे उजड़े जीवन को सजाया।
प्रेम की बगिया की तुम सुगंध मनभावनी।
मेरा सब कुछ तुम्हारा सुनो हे अर्द्धांगिनी।

छोड़ कर अपने पिता का घर।
आ गईं एक अनजान को वर।
सजा दी मेरी वाटिका को।
अपना सर्वस्य समर्पित कर।
मेरी हर सांस की तुम हो अधिकारिणी।
तुमको समर्पित प्यार मेरा सुनो हे अर्द्धांगिनी।

फूल दो बगिया में खिलाये।
सुधि संस्कार उनको दिलाये।
इस धरा पर जन्म देकर
ज्ञान गुण उनमें मिलाए।
ज्ञान की गंगा सी हो तुम सुख दायनी।
प्रेम की परिभाषा तुमसे शुरू सुनो हे अर्द्धांगिनी।

मेरी हर सफलता का तुम राज हो।
मेरी उड़ानों की तुम्ही परवाज हो।
शब्द झंकृत हैं मेरे तुम्ही से।
भाव से श्रृंगारित सुसज्जित साज हो।
चंद्रकिरणों से उतरती तुम मधुर सी हो चांदनी।
प्रेम से प्लावित नदी हो सुनो हे अर्द्धांगिनी।

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