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वर्ष: 2, अंक 27, दिसम्बर(द्वितीय), 2017



बस तुम्हें छोड़ कर.....


शुची 'भवि'


 
आँख की कोर में बसा
आँसूं तुम्हारा था
लबों की लाली में भी
रंग तुम्हारा था
सब कुछ ही तो था
तुम्हारा
बस तुम्हें छोड़ कर,,,,

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