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वर्ष: 2, अंक 27, दिसम्बर(द्वितीय), 2017



क्या बतलाएं बाबूजी !


शंकर मुनि राय "गड़बड़"



घर में सबके ऊपर दिनभर शासन करते बाबूजी
दर्द किसी के सिर में होता, याद आते तब बाबूजी। 

माँ के संग में जब तक रहते, हमें खेलाते बाबूजी
एकादशी को स्वयं न खाकर हमें खिलाते बाबूजी। 

धोती-कुरता टोपी पहने ऑफिस जाते बाबूजी
सब्जी-भाजी झोला लेकर घर को आते बाबूजी। 

भोजन की थाली लगती तब पहले खाते बाबूजी 
जब तक हम खाते रहते  हैं, बैठे रहते बाबूजी। 

सबसे पहले सोते घर में, जगते पहले बाबूजी
जिस दिन हमको नीद न आती जागा करते बाबूजी। 

स्वयं नहीं कुछ पढ़ते-लिखते, हमें पढ़ाते बाबूजी
पास होते जब मेरे बच्चे, ख़ुशी मनाते बाबूजी। 

मेरे बच्चे दादा कहते, जब हम कहते बाबूजी
बाबूजी को याद आते तब, मेरे दादा बाबूजी। 

बाबूजी अब कैसे रहते क्या बतलाये बाबूजी
माँ ने जबसे संग छोड़ा हैं, गुमसुम रहते बाबूजी।                       

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