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वर्ष: 2, अंक 27, दिसम्बर(द्वितीय), 2017



सिर्फ़ एक पत्थर ?


नरेन्द्र आर्य


  
इतने सालों  से सिर्फ़ एक पत्थर हूँ मैं
न जीवित , न मृत
न ही मुझे अब स्वप्न आते  हैं 
ना ही वे ध्वस्त होते हैं
मेरा अस्तित्व एक पत्थर और एक अस्तित्व के बीच 
जैसे कोई अनवरत तलाश है 
संभवतः कहीं  एक उचित परिभाषा का अभाव है .

अपने ही भार से कई बार 
मर चुका हूँ मैं.

रात के अविरल रुदन से 
सुबह अहसास हुआ कई बार
मेरे चेहरे  पर भी आंसू उग सकते हैं
मगर सूर्य की उष्मा ने हमेशा 
क्यों अहसास दिलाया 
मेरे अस्तित्व को पत्थर ठहराया.
क्या इसलिए कि
मैंने तैरना नहीं सीखा 
जब हर कोई समुन्द्रों को लांघने की धुन में था 
एक पत्थर को शायद डर  भी नहीं होता 
नदी के साथ बहकर उसने 
मिटने से पहले सिर्फ ठोकरे खायीं हैं 

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