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वर्ष: 2, अंक 27, दिसम्बर(द्वितीय), 2017



कौतूहल की हवाई सवारी


नरेन्द्र आर्य


  
कौतूहल भरी एक सवारी है 
हवा हवाई 
कहीं कहीं इसे जापानी रिक्शा या टुक- टुक भी कहते हैं 
जैसे कलकत्ता
चालक के बगल वाली सीट 
बिलकुल खास
लडखडाती जिज्ञासा से 
आदमी सवाल करता जाता है 
जिनके कोई पैसे चुकता नहीं करने होते 
वो सिर्फ दूरी को भाड़े से नापेगा 
और चालक के मन में उतरता चला जायेगा.
सवालों के बहाने 
एक उबा हुआ आदमी 
खुदे के जीवन को तलाशता है 
दूसरे के भीतर 
उन जवाबों से बचता हुआ 
जो पहले ही कहीं मृत हो चुके हैं
उसके भीतर 
एक चालक और एक चालक का अंतर्द्वंद 
शब्दों के मायावी जाल बिछाकर 
जैसे कि
इसकी बैटरी 
कितनी दूर कहीं ले जाती है गाड़ी
और बिजली ख़पत और उसकी आय में रिश्ता क्या है ?

...........हर बार उन सवालों से बचाता हुआ 
जो ही दम तोड़ चुके हैं 
उस सवारी के भीतर .

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