Sahityasudha view
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
मुखपृष्ठ


साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 2, अंक 27, दिसम्बर(द्वितीय), 2017



स्वागत की तैयारी


लक्ष्मी नारायण गुप्त ''गहोई ''


अपनी अपनी धर्म पत्नि से, बोले तोते,मोर, पपीहे |  
वसंत ऋतु  आने की बेला, हो कहाँ  तुम प्राण प्रिये || 

देखो पीले पात पेड़ के,  टूट टूट कर गिरें धरा पर | 
उठापटक कर वेग वायु के, उन्हें बिखेरते इधर उधर || 

आने वालों के स्वागत में, आओ इनसे  सेज सजायें |  
नव वर्ष और माघ पंचमी,  दोनों के संदेश सुनाएँ  || 

परिवर्तन के  नियम पालती, घूम रही धरती भूगोल |  
कलके काम आज निपटालें, समय बड़ा बलवान अमोल  || 
 
धरा चाहती नव तरुणाई, झेल सके जो धूप प्रचण्ड | 
पीतपर्ण नहीं रहे सुसक्षम, सहने गर्मी, जमती ठण्ड ||
 
आँखें बंद किये, ले करवट, खलियानों में पसरा पाला  | 
ऐसा लगता है सूरज को, दिया गया हो देश निकाला || 

नई धूप धरती उगलेगी , सरसों के खेतों में आकर | 
हम तुम  वासंती वस्त्रों में, चहकेंगे  खेतों में जाकर || 

कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें