Sahityasudha view
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
मुखपृष्ठ


साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 2, अंक 27, दिसम्बर(द्वितीय), 2017



कहर बरपना


हरदीप सभरवाल


 
बचपन में 
मँहगाई की मार से त्रस्त राशन के बिल 
देखकर जब माँ कहती थी 
कहर ही बरप रहा है, 
तब मैं सोचा करता था कि 
कैसा होगा, जब कहर बरपेगा, 
बाजारो में मंदी के दिन में 
खाली हाथ लौट आऐ पिता 
झल्लाते, अब और क्या कहर बरपेगा, 
मैं दरवाजे की डयोड़ीया तकता, 
प्रेम में असफल होकर नम आँखो से 
जब कोई दोस्त कहता था, ऐ खुदा 
कैसा कहर बरपा है ये तेरा, 
मैं मुस्कुरा कर ऊपर देखता, 
पर 
कहर बरपना, 
मँहगाई का बढ़ना, बाजार का ठप्प हो जाना 
या प्रेम में असफल होना नहीं होता 
कहर तब बरपता है 
जब सड़क पर गिरा एक आदमी 
तड़प कर मर रहा होता है 
और हम चेहरे पर "हमें क्या" के चस्पां भाव लिऐ 
आगे बढ़ जाते है 
जब कचरे के ढेर से कुछ बच्चे 
कुत्तो के साथ फेंके हुऐ भोजन के लिऐ 
संघर्ष करते है और हम 
वितृष्णा से मुंह मोड़ लेते है, 
जब किसी की प्रतिभा 
चंद सिक्को की कमी के नीचे दब 
दफ्न हो जाऐ 
और किसी को कोई फर्क ना पड़े, 
जब हम लोगो के अंदर 
तमाम सूक्ष्म भावनाऐ अपने 
अंत की और बढ़ने लगती है, 
इन दिनो हर दिन 
कहीं ना कहीं, कोई ना कोई 
कहर बरपता ही रहता है, 
और मैं बिना कुछ कहे तकता रहता हुं, 
एक कहर बनकर. 
 

कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें