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वर्ष: 2, अंक 27, दिसम्बर(द्वितीय), 2017



हवा का रूख


हरदीप सभरवाल


 
पतंग उड़ाता एक बच्चा, 
जरा सी मिट्टी उड़ा कर ही 
पहचान जाता है 
हवा के रूख को 
और ऊंचाईयो पर ले जाता है 
अपनी पतंग को, 
खेत में फसल बीजता एक किसान, 
महसूस करता है हवा में नमी को 
और बेहतरीन मॉनसून की आमद को पहचान 
बिखेर देता है आँखो की चमक में 
अच्छी फसल की उम्मीद, 
एक समर्पित मौसम वैज्ञानिक 
हवा के रूख को समझ कर 
पश्चिमी विक्षोभ में आऐ परिवर्तन से 
मौसम की सटीक भविष्यवाणी करता, 
पतंग उड़ाता बच्चा, फसल बीजता किसान और मौसम वैज्ञानिक 
हवा के रूख से कुछ बेहतर तलाशते है 
अपने कर्म के लिऐ,
हम भारत के लोग 
समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक 
अपने देश को ऊंचाई पर ले जाने को 
जब भी चुनाव करने आते है 
हवा के रूख को समझने की बजाय 
ना जाने कब राजनीति की 
उन्मादी हवा में बह जाते हैं
 

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