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वर्ष: 2, अंक 27, दिसम्बर(द्वितीय), 2017



डर


हरदीप सभरवाल


 
हमारे अंदर बसा डर 
कई बार 
किसी वायरस सा होता है, 
सजीव और निर्जीव के बीच की कड़ी सा, 
तमाम रक्त धमनियो में दौड़ता 
विभाजित होकर भी खुद को बढ़ाता, 
सारी की सारी जीवटता को निढाल करता, 
खत्म करता धीरे धीरे 
हमारे व्यक्तित्व को 
जिस तरह वायरस 
सिर्फ तब तक ही जीवित होता है, 
जब वह किसी जिन्दा शरीर में 
परजीवी बन कर रहता है, 
डर भी एक परजीवी सा 
जिंदा रहता है हमारी सोच और 
ख्यालात में, 
बस एक बार ख्याल से निकाल कर तो देखो, 
ये खुद ही मिट जाता है 
निष्क्रिय हो जाता है. 
 

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