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वर्ष: 2, अंक 27, दिसम्बर(द्वितीय), 2017



दिल पे झुर्रियां नहीं पड़ती


अर्विन गहलोत


 
खत तमन्नाओं से भरा
तुम जवाब बन आ जना।
दिल वही बचपन वाला 
पचपन में भी लेआना ।
तन खीन झुर्रियों से हो भरा।
फिर भी दिल की 
जवानी पे मुस्कुरा देना।
मैंने सुना दिल पे झुर्रियां नहीं पड़ती।
तुम चाहो तो मेरे दिल को आजमा लेना ।
मेरी दुआओं में तुम शामिल हो । 
असमंजस बरकरार है।
फिर भी दिल बेकरार है।
तुम्हे प्यार का क्या दे तोहफा।
मंदिर की मूरत देखो।
दिल में बनी खूबसूरत।
ये प्रतिबिंब तुम्हारा।
मेरे चेहरे का नूर बन ।
मोम सा पिघलता है।
बुढ़ापे में बचपना झलकता है।
बाकी न  इस दिल की तमन्ना  रही।
ये दम अब चाहे बेदम हो।
तृप्त तृणमूल ज्यों ओस की बूंद से ।
मेरी रुह भी  अब प्यासी न रही।
कोई कहता मझसे 
खुशियों का खजाना 
कहाँ से तुमनें पाया है।
हमरा झुर्रियों वाल।
चेहरा भी दमकाया है।
ऐहसास सोलहवें सावन
सा तुमने कराया है। 
इंतजार न अब मृत्यु का है।
असली जीने का मजा तो अब आया है।
 

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