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वर्ष: 2, अंक 27, दिसम्बर(द्वितीय), 2017



बंधु!


डा० अनिल चडडा


 
 
तिमिर, तुम ही तो हो बंधु मेरे !
है वक्ष तेरा इतना विशाल,
बन गया वेदना का दुशाल,
सुख निंद्रा में जब जग सोया
तू ही मेरे संग रोया,
तिमिर, तुम ही तो हो बंधु मेरे !

मन की कुण्ठा मन ही जाने,
कोई जाने तो भी क्यों माने,
मेरे उर में था जो अंधकार,
तुमने ही उससे किया प्यार,
तिमिर, तुम ही तो हो बंधु मेरे
	 
 

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