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वर्ष: 2, अंक 26, दिसम्बर(प्रथम), 2017



सेदोका कविता


कमला घटाऔरा


 
 (1)  
क़र्ज़ चढ़ा के 
बाप के कंधों पर 
रुलाके माता प्यारी 
आन पहुँचे 
इठलाते झूमते 
भरी स्वप्न उड़ान। 
 (2) 
अपने पांवों 
आप कुल्हाड़ी मारी 
धन रहा ना शक्ति 
बने भिखारी 
बहुत सताती यादें 
सुखद  जीवन की। 
 (3)
प्रदेसी बने 
छोड़के देश ग्राम 
आये धन कमाने 
एजेंटो ठगा 
बैठे मुँह छुपाये 
सड़कों पे हताश। 
 

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