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साहित्यसुधा के सितम्बर(द्वितीय) अंक की पीडीएफ
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वर्ष: 5, अंक 93,सितम्बर(द्वितीय), 2020

लेखक या सम्पादक की लिखित अनुमति के बिना पूर्ण या आंशिक रचनाओं का पुनर्प्रकाशन वर्जित है। लेखक के विचारों के साथ सम्पादक का सहमत या असहमत होना आवश्यक नहीं। सर्वाधिकार सुरक्षित। साहित्यसुधा में प्रकाशित रचनाओं में विचार लेखक के अपने हैं और साहित्यसुधा टीम का उनसे सहमत होना अनिवार्य नहीं है। साहित्यसुधा एक सम्पूर्णतः साहित्यिक पत्रिका है जिसका उद्देश्य सभी रचनाकारों को प्रोत्साहित करके हिंदी को बढ़ावा देना है | इसके माध्यम से हिंदी साहित्य की सभी विधाओं को सम्मिलित करने का प्रयास किया जाएगा।

साहित्यसुधा

संपादक

डॉ०अनिल चड्डा 'समर्थ'

Anil Chadah

साहित्यिक समाचार





महात्मा गांधी साहित्य मंच का उदय



महात्मा गांधी साहित्य सेवा मंच गांधीनगर का गठन दिनांक 21 अप्रैल 2020 को किया गया ,जिनके संस्थापक डॉ गुलाबचन्द पटेल कवि।लेखक अनुवादक ने लोक डाउन समय मे हिन्दी गुजराती साहित्य का और खास करके राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के जीवन आदर्श लोगो तक पहुचाने हेतु, और हिन्दी गुजराती साहित्य के प्रचार प्रसार करनेका निर्णय किया गया।..............पूरा पढ़ें






ऑनलाइन व्याख्यानमाला संपन्न


उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास के आंतरिक गुणवत्ता प्रमाणन प्रकोष्ठ (IQAC) एवं पी जी विभाग, हैदराबाद के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित ‘हिंदी भाषा के विकास में पत्र-पत्रिकाओं का योगदान’ विषयक ऑनलाइन व्याख्यानमाला संपन्न हुई। आंतरिक गुणवत्ता प्रमाणन प्रकोष्ठ के संयोजक डॉ. सुभाष जी. राणे की अध्यक्षता में संपन्न इस व्याख्यानमाला में बतौर मुख्य वक्ता प्रमुख कवि, तेवरीकार, समीक्षक, ..............पूरा पढ़ें





ऑनलाइन वीडियो कवि सम्मेलन सम्पन्न


नवीन कुमार भट्ट नीर - साहित्य संगम संस्थान दिल्ली के तत्वाधान में आयोजित शिक्षकों के सम्मान में 06/09/2020 को दोप 1 बजे से गूगल मीट पर कवि सम्मेलन आयोजित किया गया जिसमें आमंत्रित कवियों में पुणे महाराष्ट्र से आद सोनी गौतम जी,बरेली उत्तर प्रदेश से आद डॉ दीपा संजय दीप जी, लखनऊ उत्तर प्रदेश से आद अर्चना वर्मा जी, आजमगढ़ उत्तर प्रदेश से आद जयहिंद सिंह हिंद जी, जबलपुर मध्यप्रदेश से आद छाया सक्सेना जी, भिवानी हरियाणा ..............पूरा पढ़ें





हिंदी दिवस और हिंदी के बड़े लेखक!


जयपुर। राही सहयोग संस्थान द्वारा प्रतिवर्ष हिंदी दिवस के उपलक्ष्य में जारी की जाने वाली हिंदी के वर्तमान (जीवित) 100 लेखकों की सर्वे आधारित सूची वर्ष 2020 के लिए भी जारी कर दी गई है। संस्थान के कार्यकारी निदेशक प्रबोध कुमार गोविल ने बताया कि इस सूची का उद्देश्य हिंदी में नए लिखे जा रहे साहित्य को पाठकों व शोधार्थियों के बीच रेखांकित करना है ..............पूरा पढ़ें





साझा काव्य संकलन 'काव्य प्रभा' रिलीज



नई दिल्ली/मेरठ। प्राची डिजिटल पब्लिकेशन द्वारा 'काव्य प्रभा' काव्य संकलन को मंगलवार को रिलीज किया गया। 'काव्य प्रभा' काव्य संकलन में देशभर से 23 प्रतिभाशाली कवि और कवयित्री प्रतिभागी रहे। 'काव्य प्रभा' काव्य संकलन स्वयं अपने आप में यूनिक है, क्योंकि इसमें सभी कवियों की प्रतिनिधि रचनाएं है, जो आपको भाव विभोर कर देंगी। काव्य संकलन का संपादन महाराष्ट्र से सुधा सिंह 'व्याघ्र' ने किया। ..............पूरा पढ़ें







साहित्य संगम - राजस्थान इकाई का उद्घाटन


जयपुर:- साहित्य संगम संस्थान नई दिल्ली की राजस्थान प्रदेश की इकाई का उद्घाटन मंगलवार को फेसबुक मंच पर ऑनलाइन किया गया। उद्घाटन समारोह की शुरुआत माँ सरस्वती की वन्दना से हुई। ततपश्चात अतिथि स्वागत, स्वागत गान व माल्यार्पण किया गया। ..............पूरा पढ़ें




स्वर्गीय दुर्गावती चौधरी स्मृति काव्य गोष्ठी



रचनाकार समूह, कोलकाता और सुरेश चौधरी प्रस्तुति के संयोजक सुरेश जी चौधरी द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार स्व. दुर्गावती चौधरी की स्मृति में 15वीं काव्य गोष्ठी का आज ऑनलाइन आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता हैदराबाद की प्रख्यात समाज सेविका, साहित्यकार, कवयित्री सरिता सुराणा जी ने की। अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कवयित्री ज्योति नारायण जी हैदराबाद से एवं आशा पाण्डेय ओझा उदयपुर से विशेष अतिथि के रूप में उपस्थित रहीं। ..............पूरा पढ़ें





केन्द्रीय विद्यालय टेंगा वैली में शिक्षक वृन्द सम्मानित

भारतीय संस्कृति के संवाहक, सुप्रसिद्ध शिक्षाविद् , महान दार्शनिक, सुविख्यात विचारक , भारत के प्रथम उपराष्ट्रपति एवं द्वितीय राष्ट्रपति भारत रत्न डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन (5 सितंबर 1888- 17 अप्रैल 1975) के जन्मदिनोत्सव पर देश में शिक्षक दिवस मनाया जाता है। केंद्रीय विद्यालय टेंगा वैली, पश्चिम कमेंग, अरुणाचल प्रदेश में भी कोरोना बीमारी से संबंधित सरकारी दिशा निर्देशों का पालन करते हुए प्राचार्य रामकिशोर मीणा, निधि श्रीवास्तव एवं कविता राठौर द्वारा दीप ..............पूरा पढ़ें




समपादक की और से

“दौड़ है अँधी जीवन की! ”
जीवन तो चलता ही जाये, ज्यों उड़ जायें आ काले बादल, कौन है जाने कल क्या होगा, सोच के तू क्यों है पागल । कौन मिलेगा इन राहों में, सब कुछ पहले से तय है, जीवन की मुश्किल राहों को, करना फिर भी तो तय है, करते जाओ कर्म को अपने, हँस के करो या रो के करो, सोच-सोच के फल की बाबत, आगे बढ़ने से न डरो, सामना करने को दुनिया का, खोल ले तू मन की साँकल । इस झूठी दुनिया में मुश्किल सच्चे लोगों का मिलना, छोड़ो दुनिया के लोगों की, तुम तो सच्चे ही रहना, बात पते की कहता हूँ मैं, सुनना चाहे न सुनना, दौड़ है अँधी जीवन की, पर खाली हाथ ही तो मरना, तृष्णा के पीछे लग कर न बन जाना तू यूँ ही जाहिल । - डॉ० अनिल चड्डा 'समर्थ'

अब तक

आपके पत्र


संपादक महोदय,

साहित्यसुधा की अपार सफलता के लिए हार्दिक बधाइयाँ।

हेमंत पांडेय
वरिष्ठ वैज्ञानिक,
भोपाल
hemantpandey1986@gmail.com

बहुत सुंदर व पठनीय अंक बधाई

shashank misra

Mahoday

Aap ki saree rachnayen andolit kartee hain.
Ati uttam se bhee uttam

Sadhuwad

Anil Mishra

लोक प्रिय वेब पत्रिका "साहित्य सुधा " का जुलाई द्वितीय 2020 अंक पढ़ा। अंक में संकलित कविता, कहानी, लघुकथा, संस्मरण सभी पठनीय हैं। इस अंक में मूर्धन्य साहित्यकार, प्रख्यात भाषाविद और सुधी समीक्षक डॉ शंकर सिंह तोमर का महाभारत महाकाव्य पर केंद्रित लेख "महाभारत जीवन जीने की कला" ने विशेष आकर्षित किया। मेरे मत में यह अभूतपूर्व लेख है।
लेखक ने महाभारत के विभिन्न प्रसंगों, घटनाओं के बारे में अपने ढंग से विचार व्यक्त किये हैं जिन पर मुझ सहित हर किसी का सहमत होना आवश्यक नहीं है पर इस लेख में कई आप्त-वाक्य मिले हैं, (जो मोटे अक्षरों में उल्लेखित किये गए हैं।) जो निश्चित रूप से मननीय हैं। इन आप्त वाक्यों में से दो ने विशेष रूप से मेरा ध्यान आकर्षित किया है।
महाभारत कालातीत यथार्थ है, जबकि रामायण कालातीत आदर्श।
महाभारत का जो ताना-बाना है, उसमें जो घटनाएँ तत्समय घटित हुईं, वे ऐसी घटनाएँ हैं जो आज भी घटित हो रही है, भविष्य में भी घटित होती रहेंगी। सांसारिक मनुष्य की सोच ही ऐसी है कि वह उसके जन्म से अंत तक इस लेख में वर्णित मनोभावों के आसपास ही घूमती रहती है।
रामायण जैसा आदर्श अन्यत्र दुर्लभ है।
सत्य, वचन-प्रतिबद्धता काल सापेक्ष होती है, निरपेक्ष नहीं।
"वचनबद्धता" काल सापेक्ष होती है, होनी भी चाहिए; क्योंकि यही सच है इससे इतर सोच केवल आलंकारिक ही कही जा सकती है।
"सत्य" के बारे में यह कहा जा सकता है कि सत्य तो हमेशा सत्य ही होता है वह काल सापेक्ष कैसे हो सकता है।..... सत्य काल सापेक्ष हो सकता है।
कैसे ?
ऐसे-
"सत्यम् वद" के लिए प्रख्यात एक ब्रह्मज्ञानी संत ध्यान क्रिया उपरांत चिंतन-मग्न थे कि उसी समय उनके सामने से तेज गति से भागता हुआ एक हिरण निकलता है। उसकी घबराहट से सन्त समझ जाते हैं कि यह किसी मुसीबत में है। किंचित देर बाद उसी रास्ते से एक बधिक आता है जिससे हिरण आया था। बधिक रुककर संत से पूछता है कि महात्मन क्या अभी इधर आपके सामने से कोई हिरण निकला है?
संत ने कहा-नहीं।
बधिक को ज्ञात था कि यह सन्त सदैव सत्य बोलते हैं; इसलिए वह यह सोचकर वापस लौट गया कि सम्भवतः हिरण किसी और गली से कहीं और निकल गया होगा।
एक काल सापेक्ष सत्य से एक निरीह प्राणी का जीवन बच गया; बधिक के भोजन की पूर्ति तो अन्न, फल-फूल, शाक-पात से भी हो सकती है, हो भी गयी होगी।
एक अच्छे लेख के लिए रचनाकार और सम्पादक को बधाई।

प्रेषक-
(इंजी.) संगीता सिंह
बंगला नम्बर-1
जजेस निवास
सिविल लाइन्स
सिरोंज जिला विदिशा (म.प्र.)

आँचल सोनी हिया की रचना "भोर भई अब बासी रे" के परिपेक्ष्य में।
रचनाकार की रचना अद्वितीय है। उच्च कोटि की लेखन शैली के साथ शब्द चयन भी खूबसूरत है। लेखिका ने संसारिक मोह माया से दूर एक काल्पनिक आन देश की जो कल्पना की है, वाकई बेजोड़ है। हिया जी, इस तरह की रचना और लाए, आप की यह रचना अनमोल है।

धन्यवाद।

पंकज गुप्ता

"छाती पर भार लिए बैठा हूँ।" डॉ चड्ढा की बेहतरीन,यथार्थ परक रचना है।"भरे बाजार में बिकने के लिये, मैं अपने संस्कार लिये बैठा हूँ।" दोनों स्थितियां स्पष्ट होती हैं-इस बाजार-युग में हमने संस्कार भी बेच दिए हैं।यह भी की बाज़ार वाद में भी हम अपने संस्कार सुरक्षित रखने में सफल हुए है।अब "जिसकी रही भावना जैसी" वैसा अर्थ ग्रहण कर सकेगा। "वो चाहें जितना भी दगा कर लें, मैं तो दिल में प्यार लिये बैठा हूँ।" बहुत सुंदर सन्देश है।साहित्य का उद्देश्य भी यही है।यही सत्यं शिवम सुंदरम की स्थिति है।बधाई हो चड्ढा जी को।

- डॉ आर बी भण्डारकर
भोपाल


सुंदर अंक सब रंग विधा का। साहित्य की बहुमुखी प्रतिभाओं का विस्तृत कैनवास ।

सादर
- विश्वमोहन

आभार, इतनी बेहतरीन पत्रिका का।

सप्रेम एवं सादर ,
विश्वमोहन

इस अंक में

गीत, गज़ल, इत्यादि

आलेख, कहानियाँ, व्यंग्य, इत्यादि

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