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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 69, सितंबर(द्वितीय), 2019

जरूरतों का नुकसान

राजीव कुमार

श्वेता अपने पति की ज्यादतियों से तंग आकर अपने मायके चली गयी। लड़ाई-झगड़ा रोज की बात हो गयी थी। पति बहला फुसलाकर अपने घर ले जाने के लिए आया। पति की घड़ीयाली आंसू और माता-पिता के मनाने के बाद, पति के साथ ससूराल आ गई। ननद ने पास आकर कहा ’’ भाभी, आप नहीं थे तो फूलदान की पेंटिग भी अधूरी रह गयी, तकिया के कवर पर कासिदे का काम भी नहीं हो पाया। ’’

बड़ा देवर आकर कहने लगा ’’ भाभी मटर के पराठे खाने को मन तरस गया था। ’’

छोटा देवर कहने लगा ’’ भाभी कपड़े में प्रेस नहीं होने के कारण दोस्त लोग मेरी अनदेखी करते थे। ’’

श्वेता के चले जाने के बाद कुछ न कुछ नुकसान सबका हुआ था जिसकी भरपायी अब पूरी हो जाने वाली थी। लेकिन श्वेता के कान ये सूनने को तरस रहे थे कि ’’ भाभी अब मैं बड़ा हो गया हुं और हमलोगों के होते हुए भइया से आपको डरने की कोई जरूरत नहीं है। मेरे रहते भइया अब आप पर हाथ नहीं उठा सकते। ’’


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