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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 69, सितंबर(द्वितीय), 2019

काला चश्मा

राजीव कुमार

एक आदमी काला चश्मा लगाकर ही घर से बाहर निकलता था, दिन में भी और रात में भी। पता नहीं उसको अंधेरा पसंद था या काला चश्मा लगाकर आकर्षक दीखना चाहता था और तारीफें बटोरना चाहता था।

एक आदमी ने उससे पूछा ’’ तुम दिन में और रात में भी काला चश्मा लगाकर क्यों चलते हो? ’’

अपने जवाब में उसने कहा ’’ तुम तो जानते हो कि शहर में आए दिन मार-पीट, छिनतई और बलात्कार की घटनाएं होती रहती है। सब को देखकर मेरा दिल दहल जाता है। ’’

सामने वाला आदमी हँसते हुए बोला ’’ इसमें कौन सी बड़ी बात है, चश्मा के उस पार तो सब दिखता होगा? ’’

चश्मे वाले ने सिर हिलाते हुए कहा ’’ हाँ भाई दिखता तो सबकुछ है, जीतना तुमको दिखता होगा। लेकिन लोग यह कह देंगें कि तुमने सबकुछ देखा है, लेकिन मैं झूठ बोलकर खुद को बचा लुंगा। ’’ बोलकर काला चश्मा वाला व्यक्ति आगे निकल गया और सामने वाला आदमी समझने की कोशिश करने लगा, खुद में उस चश्मा वाला का अक्स देखने लगा।


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