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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 69, सितंबर(द्वितीय), 2019

अमरबेल

नज़्म सुभाष

तीसरा बताशा मुँह में रखते ही उसकी नज़र स्टॉल पर लिखे स्लोगन पर गयी। "बिस्वाँ के मशहूर गोलगप्पे" उसका मन हुआ कि वो ज़ोर से हँसे मगर इस वक़्त की हँसी उसके लिए खतरनाक हो सकती थी बताशे का पानी मुँह में ही था।उसने सोचा, खाने -पीने की चीजों के लिए मशहूर लखनऊ में भला कोई बिस्वाँ जैसे छोटे कस्बे की मशहूरियत का क्या अचार डालेगा..बहुतों को तो शायद ये भी न पता हो कि ये है कहाँ पर....फिर स्टॉल वाले ने क्या सोचकर ऐसा स्लोगन लिखवाया होगा.. वो कुछ देर ख़ुद ही सोचता रहा फिर जब किसी नतीजे पर न पहुँच सका तो उससे ही पूछ लिया-" भाई ! लखनऊ जैसे शहर में ये बिस्वां के नाम से कौन आपके पास बताशे खाने आएगा?" लहजा मज़ाक उड़ाने वाला था।

बताशे वाले ने अबतक चौथा बताशा उसके दोने मे रखकर एक कपड़े में हाथ पोछे और बड़ी संज़ीदगी से बोला-"साब हम जड़ों से कटे हुए विस्थापित लोग हैं...बस अपनी जड़ों को न भूलें इसीलिये ये नाम रखा है..बाकी बताशे की बिक्री तो पानी के टेस्ट पर निर्भर करती है "

"मैं कुछ समझा नहीं"

"कोई भी इन्सान अपनी जन्मभूमि कभी नहीं भूल पाता..मैं बिस्वाँ का हूँ मगर मेरे पास कोई जमीन जायजाद न थी। लिहाजा यहाँ हूँ यदि वहाँ कोई जरिया होता तो इधर आता ही नहीं"

"मगर अब तुम्हारी जीविका तो लखनऊ से ही चल रही है"

"यक़ीनन ..इसमें कोई शक नहीं...मगर जन्मभूमि आख़िर जन्मभूमि होती है"

"मैं नहीं मानता..ऐसी जन्मभूमि के लिए इतना भावुक होने की क्या जरूरत जो दो वक़्त की रोटी न दे सके..सच कहूँ तो तुम्हें इस पर लखनऊ के मशहूर बताशे लिखना चाहिए... आखिर सबकुछ तो यहीं का है।"

इस बार वो जरा मायूस हुआ..अब क्या जवाब दे।बस यही पूछ पाया-"आप प्रॉपर लखनऊ के हैं"

"निःसंदेह"

"शायद इसलिए...ख़ैर ! आप प्रॉपर लखनऊ के हैं तो शायद ये क़िस्सा सुना हो कि लखनऊ के अन्तिम नवाब वाजिद अली शाह को जब अंग्रेजों ने 1856 में लखनऊ से कलकत्ता भेजा...तो वो बड़े भारी मन से कलकत्ता ये कहते हुए गये "बाबुल मोरा नैहर छूटा जाए" जानते हैं कि ये नैहर क्या था? ये थीं उनकी जड़ें...जहाँ से वो एकाएक विस्थापित किए जा रहे थे। कहते हैं कलकत्ता में वो जिस जगह पर रहे वहाँ भी एक छोटा- मोटा लखनऊ बसा लिया..क्या जरुरत थी उन्हें ..आखिर कलकत्ता के आगे लखनऊ की क्या बिसात रही होगी?"

"ये निहायत भावुकता थी इससे ज्यादा कुछ नहीं।मैं तो उस शहर की ही तारीफ़ करता हूँ जहाँ से पैसा मिले।वैसे भी बस पासपोर्ट वीजा बनने की देर है मैं बहुत ज़ल्द अमेरिका में बसने वाला हूँ फिर कौन याद करेगा इस लखनऊ को.." कहते हुए उसने अजीब सा मुँह बनाया।तबतक एक कस्टमर आ चुका था लिहाजा बताशे वाले ने उसे एक दोना पकड़ाया और बुदबुदाते हुए बोला-" भाईसाब ! आप सही कह रहे हैं मगर मैं जड़ों की बात कर रहा हूँ अमरबेल की नहीं"


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