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वर्ष: 3, अंक 45, सितम्बर(द्वितीय) , 2018



भगवान नहीं मिलता


वर्षा वार्ष्णेय


 
बीत जाती है उम्र यूँ ही अक्सर इंतजार में,
कोई हमउम्र, कोई हमनवां नहीं मिलता ।

चाहत होती है यहाँ सिर्फ जिस्म की ,
रूह का सच्चा तलबगार नहीं मिलता ।

यादों के घरोंदे दे जाते हैं सिर्फ उदासी 
होठों पर हो मुस्कान अक्स नहीं मिलता।

यूँ तो हजारों शख्स हैं दुनिया में ,
दे जाए दिल को राहत वो इंसान नहीं मिलता।

भाग रहे जाने किस अंधी दौड़ में ,
बैचैन पलों को चैन दे, भगवान नहीं मिलता		 
 

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