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वर्ष: 3, अंक 45, सितम्बर(द्वितीय) , 2018



युवाओं के गिरते नैतिक मूल्य का कारण


अजय एहसास


आज का युवा किस प्रकार दिशा भटक रहा हैं! ये बात कोई नहीं सोच रहा हैं। इसके परिणाम भी देखने को मिलने रहे हैं आजकल कल महंगाई के दौर को देख के युवा शौक पूरे करने के लिये अपनी मंजिल छोड़ कर दूसरा रास्ता अपना रहा है।

12वी पास करने के युवा जब कॉलेज में पहुँचने के वक्त बहुत शरीफ होता हैं। वहाँ किसी खानदानी रइस विद्यार्थी के शौक लग्जरी कार और उसके ताम-झाम को देखकर कुंठित होकर वो गलत रास्ता अपना लेता हैं। फिर उसी कॉलेज के विद्यार्थियों से मित्रता बढ़ते-बढ़ते वो सारे विद्यार्थी बड़ी संख्या में अपना attitude(वजूद) बढ़ाने के चक्कर में चोरी लूट डकैती तश्करी जैसे रास्तों पर सवार हो जाते हैं।

सबसे ज्यादा क्रेज उनका तब बढ़ता जब वे एक दूसरे मित्र की हैसियत का नाप अपने आत्म मंथन(मन ही मन मे) करते है सोचता है इसके पास महंगा फोन है महंगे कपड़े है महंगे शूज है चढ़ने के लिए रॉयल एनफील्ड हैं। मैं भी इसकी बराबरी करूँ मन ही मन ये धारणा करके फिर अवसादित होकर वो अपने आप मानसिक रूप से प्रताड़ित होकर आगे की सोचता हैं मगर पीछे माँ-बाप परिवार की तरफ नहीं देखता हैं और किसी नामचीन तस्कर के साथ मेवाड़ की तरफ जाने वाली लग्जरी गाड़ी में सवार हो जाता है और कार बजने वाले गाने के साथ फेसबुक पर लाइव आता हैं फिर थोड़ा सा खुद को vip महसूस करता है उस तस्कर के साथ बैठा देखकर फिर उसको लाइव देखने वालों मित्रो द्वारा उसका कमेंट बॉक्स में भावनात्मक टिप्पणियों द्वारा(वाह भाई, क्या बात है, wow, भाई के साथ) होंसला अफजाई होता है फिर वो गाड़ी में बजने वाले गाने वा वॉल्यूम बढ़ाता हैं और मन ही मन खुद का स्तर बढ़ा लेता है। गाड़ी सुरक्षित वापस पहुँचती तो उसको थोड़ी बहुत राशि मिलने के बाद उसकी उम्मीदों को और पंख लग जाते हैं और अगले चक्कर के लिए सोचने लगता हैं। ऐसा करते करते वो युवा बड़ी बड़ी बातों के सपने देखता हैं फिर जो भी मिलता उसके सामने खुद को एक अलग ब्रांड की तरह पेश करता हैं। और खुद की बात नामचीन तस्करों के साथ जोड़कर अपने रिश्तेदारों और परिवार वालो को अपने पक्ष में माहौल क्रिएट करने की भरपूर कोशिश करके उनको मना लेता है। इतना होने बाद वो अपने एरिया का माफिया(डॉन) बनने की ठान लेता है और अपनी कोशिश करके कहीं से अवैध हथियार का जुगाड़ कर लेता हैं फिर अपने खिलाफ कोई भी बोलता हैं उसको खुद का ख़ौफ़ दिखाने का काम शुरू कर देता हैं।

गांव से अपना ख़ौफ़ शुरू करने की कोशिश करते करते वह व्हाट्सएप्प और फेसबुक मित्रों डॉन की फीलिंग लेता हैं और व्हाट्सएप्प पर ग्रुप की बहस कई बार धरातल पर लड़ाई (खून-खराबे) तक आ जाते है अकसर ऐसे बहुत से मामले देखने को मिल रहे हैं।

अब इस बात का जिम्मेदार किसे माना जाए ये सबसे बड़ा सवाल है इन युवाओं के माता-पिता तो सीधे-सादे होते है इसमें कोई दो राय नहीं है ।उनकी बात को मानते यह बात मान सकते है। इंसान दुनिया से जीत जाता है मगर औलाद से हार जाता है यह बात भी सटीक बैठ रही है इस मामले में।

सबसे बड़ा दोषी इसमें समाज है जो इन तस्करों को कोई सामाजिक या वैवाहिक समारोह में अग्रिम पंक्ति में बैठाते हैं और उनसे हाथों से कोई शुभारंभ या कोई काम करवाते है तो उनसे क्या सीख लेगा वो युवा जो उस समारोह में मौजूद हैं

मैं बात सर्वसमाज की कर रहा हूं मेरा निशाना कोई पर्सनल नहीं हैं हर जगह दहशतगर्दी हो रही हैं भोले-भाले गरीब लोग इस दहशत का शिकार हो रहे हैं ।

राजनेता ऐसी घटनाओं पर अपनी रोटियां सेंकने में लग जाते हैं जिस युवा के साथ ऐसा होता है उसे लेकर राजनेताओं की कोई सहानुभूति नहीं होती हैं उल्टा ये बोलते हैं कि फायरिंग फलाने समाज के युवा ने अपने समाज के युवा पे की और वहाँ मौजूद लोगों को भावनात्मक रूप से बरगलाने की कोशिश करते है बाकी वो नेता ये नहीं सोचते कि मेरे क्षेत्र में ऐसा क्यु हो रहा है इसका जिम्मेदार कौन हैं इन युवाओं को समझाया जाए तो इसका परिणाम मिल सकता हैं मगर नेता इन बातों से कोसों दूर रह कर अपनी रोटियां सेंकते नजर आते हैं। जिसका शिकार हम आम जनता होती हैं इसका परिणाम सामने हैं और आने वाले समय मे हालात और भी विकट हो जाएंगे।

इससे बचाव का उपाय ये है की कोई समारोह में मादक पदार्थो का सेवन नहीं होना चाहिए। वैवाहिक समारोह में ताम-झाम कम करना चाहिए ज्यादा खर्च करने की बजाय व्यवस्थित खर्च होना चाहिए। गांव वालों और रिश्तेदारों के अलावा कोई समारोह में फालतू मेहमानबाजी नहीं से भी परहेज होना चाहिये। बाकी गांव के जिम्मेदार आदमियों को गांव में होने वाली हलचलों पर नजर रखनी चाहिए। और माता-पिता को अपने बच्चों को संस्कार देना सबसे उपयोगी साबित हो सकता हैं।


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