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वर्ष: 3, अंक 45, सितम्बर(द्वितीय) , 2018



वो कविता


सुशील शर्मा


                           	 	  
वो कविता
जो ऊगी हो
मन मे नए बीज सी
या सुबह की बयार लिखो
जो होले से गालों को
छू कर स्पंदित कर देती है।
वो कविता
जो अभी अभी
जन्मी है नवजात
जिसके गुलाबी गाल
नन्हे शिशु से मुस्काते हैं।
वो कविता
कभी हम गाते थे
बैठ कर उस बगीचे में
जो तुम्हारे कालेज 
के पीछे था।
वो कविता
जो तुम्हारी पायल की
रुनझुन से शुरू होकर
तुम्हारी खिलखलाहट
में बदल जाती थी।
वो कविता
जो कक्षा के समय
तुम्हारी कापी के पन्नों
से निकल कर
गुलाब में लिपट कर
मुझ तक आती थी।

वो कविता
जो तुम्हारे आंसुओं से 
भीग कर मेरे कंधों पर
टिक जाती थी।

वो कविता
जो तुम्हे मुझ से दूर 
ले जाकर मुझे रुलाती थी।
वो कविता जो
मुहब्बत प्यार से इतर
विश्वास पर टिकी थी।
वो कविता
जो तुम्हारे जाने के बाद भी
हमेशा मेरे अंतरात्मा में बसी थी
वो कविता
जिसने तुम्हे दूर करके भी 
हमेशा मुझे अपने पास रखा
वो कविता
 

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