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वर्ष: 3, अंक 45, सितम्बर(द्वितीय) , 2018



पिता और समय


रवीन्द्र कुमार दास


                           	 	
जैसे समय गुजर जाता है 
वैसे ही पिता भी गुजर गए 
समय की तरह कुछ दे लेकर
और हम सभी भाई बहन उन्हें याद करते हैं
जैसे बीते समय को याद करते हैं
जब वे थे
तब हम समय को नहीं पिता को जानते थे 
अब, जब वे नहीं हैं
हम समय में हाथ पैर मारते हैं
समय हमें जानता है या नहीं
बताना मुश्किल है
पर पिता एक टूटे हुए छाते की तरह
भरसक 
बचाते रहे थे हमें
पर इन हम पिता को नहीं समय को देते हैं श्रेय
पिता किसी अजनबी रेलवे स्टेशन से
विस्मृत हो रहे हैं स्मृति से
अभी यही तो कोशिश कर रहा हूँ समझने की
कि पिता के लिए प्यार क्यों नहीं है 
जबकि पिता 
अपना सबकुछ निछावर कर गए हैं यहीं
 

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