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वर्ष: 3, अंक 45, सितम्बर(द्वितीय) , 2018



इतिहास बाह्य


रवीन्द्र कुमार दास


                           	
गर्मियों के दिन हैं
वह लकड़ियां चुनने वाली
बैठ गई है घनी छाँव में
चश्मे का पानी पीकर 
लेट गई है कुछ देर सुस्ताने
आहट हुई
तो देखा एक पहचाना चेहरा
जो छूट गया था कुछ साल पहले
वह भी जंगलों में ही काम करता है
उसे बहुत सुख मिला
उसने पास में बैठने का इशारा किया
दोनों श्रांत थे
दोनों तृष्णार्त
बह निकली भाव की रसधारा
किसी ने कुछ नहीं देखा
कहीं कुछ भी दर्ज नहीं हुआ
कभी कोई चर्चा नहीं हुई
 

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