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वर्ष: 3, अंक 45, सितम्बर(द्वितीय) , 2018



अन्तरात्मा का झूठ जीत गया


रश्मि सिंह


                          
कुछ सच्चे कुछ झूठे
रच लूँ मैं प्रेम की 
नई-नई परिभाषाएं।
बहाऊँ कुछ ऐसी नदियाँ
बह जाऊं संग उसके
जानती हूँ
है मेरे झूठ की उम्र बस 
चन्द लम्हो की
चहकती हूँ मैं
जिस वक़्त रचती हूँ
 एक झूठ को।
उस अबोध बालक की तरह
जो नए खिलौने के मिलने पर 
होती है चहक उसकी।
और सच
उसकी औकात नही इतनी
की वो साबित कर दे खुद को
मेरी एक ज्वालामुखी सी धड़कन
सच को दबा कर जला कर मार देती है ।
जानती हूँ जिसदिन
खुलेगा सच का पिटारा
टूटेंगे कई कई 
रिश्ते ,छूटेंगे सब प्रेम मोह के बंधन।
पर मैं हूँ इस क़दर बीमार
लगता है जिसदिन झूठ का साथ छुटेगा
मिट जाएगा मेरा वजूद
और देखो हो गई सुबह
मेरे भीतर के झूठ को जगा
मैं चली बहाने फिर से नाइ जगह
नए रिश्तो में अपने झूठ को बहाने।
 

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