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वर्ष: 3, अंक 45, सितम्बर(द्वितीय) , 2018



अक्स


रश्मि सिंह


                          
सर्द रात जब तुम
असहाय पीड़ा में थी
मेरी किलकारी ने
तुम्हारे सारे दर्द को भुला दिया था
और तुम मुस्कुराते हुए बोली थी
तुम मेरा अक्स हो
और मैं झिलमिलाती हुई
बढ़ रही थी फिर
उस रात जब
तुम्हारा अक्स दुबारा आया
तो तुमने भी मुँह फेर लिया
और कह ही दिया
मेरा कलंक आया आज जमी पर
माँ फिर तुम भी बदलने लगी
कारन कौन था माँ मैं या
घर समाज का वो ताना
जिसने तुमसे तुम्हारी ही ममता को
कलंक कहला डाला
माँ मैं आज भी वही हूँ
तुम्हारा अक्स
फिर तुम क्यूँ आज बन गई 
माँ से एक सोच का अक्स?
 

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