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वर्ष: 3, अंक 45, सितम्बर(द्वितीय) , 2018



निर्बंध दर्द


पुष्पा मेहरा


 
बहुत प्रतीक्षा के बाद
तपते आकाश में 
बादल छाए ,गहराए, 
उन्माद भरे प्रथम तो   
गरज-तरज बिजलियाँ 
कौंधाते रहे ,फिर 
अचानक आवेश में आ 
धुआँधार बरस पड़े |

अति वृष्टि -
नदियों के कगार तोड़ 
खेत –खलिहान डुबा 
सड़कों ,गली -कूँचों और 
घरों में पसर गई  | 

देखते –देखते 
धरती का शृंगार घन -
अपने ही हाथों से उसे  
पल भर में उजाड़ गए ,
तन –बदन में 
विष भरे तीर से चुभ    
होशोहवास गुमा गए |

दिनों तक इंतज़ार के बाद 
मिला भी तो क्या 
एक निर्बन्ध दर्द -
हर एक को  
रोमांचित करता - 
दिल दहलाता, 
चेतना में समा कर 
जन – जन के मुख की 
फीकी मुस्कान भी 
छीन ले गया | 

दूसरी ओर
समाचार माध्यमों से 
पहले बादलों , फिर 
वर्षा और उसका आतंक 
राम लीला के दृश्य की तरह 
लगातार चलता रहा |

दिन ढला ,
रात भी ढलने को आई 
आँखों से सपने
मुख मोड़ गए  
जीवंत दृश्य 
सामने मंडराते रहे ||

मन में प्रश्नों के धरने 
आ बैठे हैं 
उत्तर का इंतज़ार है ........... 		 
 

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