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वर्ष: 3, अंक 45, सितम्बर(द्वितीय) , 2018



रोती लड़की


पीताम्बर दास सराफ"रंक"


                        
खे़त ख़लिहानों में 
दौड़ती ,भागती बच्ची
जान न पाई
उस घूरती हुई आँखो के
मकसद को

उसे स्त्रीत्व के बोझ से लदे
स्पंदनों का
आभास तो था 
पर चिंता नहीं थी

वह सहज थी
सरल थी बातचीत में

उसे बातचीत में छुपी
गद्दारी का
तनिक भी आभास न था

वह उस गद्दार के साथ
चली गई इस प्रलोभन में
कि वह उसे ताजमहल दिखायगा

इस प्रलोभन में 
उसने अपना सारा यौवन
सौंप दिया उस गद्दार को

सुबह उसे न तो 
वह गद्दार दिखा
न ताजमहल

वह लौट आई 
अपनी उन्हीं पगडंडियों पर
उसने गांव के खेत खलिहानों की
मिट्टी को चूमा 
और रोने लगी

सहेलियों ने भांप लिया
गले लगाने के बजाय
झटक दिया

अब वह अकेली थी
उसे आभास हुआ
अपने पेट में पनपते जीवन का

मां बाप ने देखा तो डसा
सहेलियों ने देखा तो डसा
रिश्तेदारों ने देखा तो डसा

डसी हुई ज़िंदगी लेकर
वह अंतहीन गंतव्य की ओर
भागी
तो पेट में पलते जीवन ने उसे
हिम्मत रखने के लिये कहा

वह लौट आई
उसने कुदाली थामी
और चीरती रही धरती को तब तक
जब तक उसके पेट की पीड़ा ने
उसे असहाय न कर दिया

उसने एक बच्ची को जनम दिया
वह अपनी बच्ची को चूमती रही
और रोती रही
यह सोच सोच कर
कि ईश्वर ने लड़की क्यौं दी 

वह भी असहाय की लड़की
एक अभिशाप के सिवा कुछ नहीं।
 

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