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वर्ष: 3, अंक 45, सितम्बर(द्वितीय) , 2018



और कितने दूर्योधन


हरदीप सबरवाल


                           	 	  
हस्तिनापुर में तो 
केवल एक धृतराष्टृ था, 
और आज के आधुनिक भारत में 
अनगिनत धृतराष्टृ 
अपनी अपनी महत्वाकांक्षायों 
अपने अपने धर्मो और जातियों की 
हस्तिनापुर बनाते 
बनाते किले अराष्टृियता के 
यहां राष्टृ से अधिक 
परिवार-वाद महत्वपूर्ण है 
निजी स्वार्थो से घिरे 
अनीति को नीती बनाते 
पाप को पुन्य मे परिभाषित करते 
कुतर्को से सींचते 
अपने अपने दूर्योधनो की 
अनैतिक कामनायों को 
ये आंखो वाले धृतराष्टृ 
हस्तिनापुर में तब 
श्रीकृष्ण आऐ थे 
सारथी बन कर धर्मक्षेत्र के 
पर इस बार शायद 
ये देखकर मुस्कुरा रहे हो कहीं 
या फिर इन्तजार कर रहे हो 
कि कब जलेगी वो अलख 
जो श्रीकृष्ण ने जलाई थी 
कभी अर्जुन में 
भारत के हर मानव में 
राष्टृ के लिए . 
 

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