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वर्ष: 3, अंक 45, सितम्बर(द्वितीय) , 2018



ढूंढते हैं


अजय अज्ञात


 
इधर ढूंढते हैं उधर ढूंढते हैं 
बगीचे में बूढ़ा शजर ढूंढते हैं 
कहाँ खो गया है वो बचपन न जाने
पुरानी हरिक रहगुज़र ढूंढ़ते हैं 
वो अल्हड़ जवानी वो पहली मुहब्बत
नहीं मिल सकेगी मगर ढूंढते हैं 
लिखा था जहाँ भी तेरा नाम हमने
वो पत्थर पहाड़ी शजर ढूंढते हैं
न जाने कहाँ अब है रहती शराफ़त
मोहल्ले में हम उसका घर ढूंढते हैं 
समाचारपत्रों में चश्मा लगा कर
कोई एक सच्ची ख़बर ढूंढते हैं
अजय फेसबुक पर हैं कुछ लोग ऐसे 
जो मेरे सुख़न में हुनर ढूंढते हैं
	 

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