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वर्ष: 3, अंक 45, सितम्बर(द्वितीय) , 2018



दीपक


नवीन कुमार भट्ट


 
दीपक हरे
जलकर अँधेरा
देता प्रकाश।।१

दीप लड़ता
आँधेर मे दीपक
करता रोशनी।।२

जय जगत
दिखाये विद्यमान
जले दीपक।।३

बनूँ रक्षक
मिटाकर आँधेरा
हरूँ अज्ञान।।४

सबका मान
बढ़ाता नितदिन
अज्ञान हर।।५

दीप जलता
अज्ञान निगलता
ज्ञान सागर।।६

हरे अज्ञान
दिलवाता हमेशा
प्रकाश धार।।७

दीप अज्ञान
हरण कर बना
दे ज्ञानवान।।८

विदा अँधेरा
कर ज्ञान बहाये
दीपक जल।।९

नवीन दीप
जलाकर अज्ञान
प्रकाश भरे।।१०

एक दीपक
अज्ञान पथ पर
भरता ज्ञान।।११

ज्ञान अज्ञान
फर्क बताया दीप
खुद जलाके।।१२

अथाह ज्ञान
कर समेट लेता
दीपक एक।।१३

दीपक मान
मर्यादा पहचान
भरता ज्ञान।।१४

बनाये राह
हर अँधियारा
भरे प्रकाश।।१५

दीपक जले
अज्ञान मिटाकर
ज्ञान भरते।१६

खुद खोकर
अज्ञान मिटाकर
लौटे दीपक।।१७

हमारा मान
राहों पे दिखाकर
रोशनी देता।।१८

दीपक हँसे
हटे जब अज्ञान
फैलता ज्ञान।।१९

अज्ञान मिटे
बढ़ता निरंतर
दीप अकेला।।२०

दीप रहता
अग्रशर आँधेरा
हर दे ज्ञान।।२१            

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