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Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 92,सितम्बर(प्रथम), 2020

जीवन की संध्या

राकेश कुमार तगाला

नवीन जी,कई दिनों से इसी पेड़ के नीचे घण्टों बैठे रहते थे।

उन्हें यहाँ आए,काफी समय हो गया था।पर वे अभी तक यहाँ के परिवेश से तालमेल नहीं बिठा पा रहे थे।वैसे भी इस उम्र में नई जगह घुल-मिल पाना बहुत कठिन काम होता है।मैं भी शुरू-शुरू में,यहाँ पर बहुत असहज महसूस करता था।पर धीरे-धीरे ही सही मैंने अपनी नियति स्वीकार कर ली थी।कितना मुश्किल होता हैं,अपनो से दूर रहना?जिनके साथ पूरा जीवन बिता दिया हो।और वहीं अपने,इस बुढ़ापे में हमें इस वृद्धाश्रम में छोड़ जाते हैं।

ना चाहते हुए भी मेरे कदम नवीन बाबू,यानि बड़े बाबू की तरफ चल पड़े।उन्हें सभी प्यार से बड़े बाबू ही कहते थे।उन्होंने मुझें करीब आते देखकर अपने चेहरे पर फीकी मुस्कान फैला दी।हम सभी ऐसा ही तो करते हैं।लोगों के सामने अपने भीतर के दर्द को छिपा लेते हैं, और चेहरे पर बनावटी हँसी हँसते रहते हैं।

क्या हाल है?बड़े बाबू।आज आप बड़ी देर से पेड़ो पर बने घोसलों को निहार रहे हैं।जी- जी.....घोंसले, कह कर नवीन

बाबू फिर कुछ क्षणों के लिए चुप्पी साध गए।कुछ ठहर कर बोले,घोंसले मुझें अपनी ओर खींच लेते हैं।पक्षी कितने जतन से,तिनका-तिनका जोड़ के अपने बच्चों के लिए घोंसला बनते हैं,उनकी सुरक्षा के लिए।पर बच्चे....कहतें-कहतें वो एक बार फिर मौन हो गए।

नवीन जी,चलिए थोड़ा टहल लेते हैं, शरीर स्वस्थ बना रहेगा।हम दोनों धीमे- धीमे कदम बढ़ा रहे थे।नवीन जी,ऐसा कौन- सा पहली बार हुआ है हम बूड़ो के साथ।लोग कहते हैं बुढ़ापा श्राप है।क्या आप भी ऐसा मानते हैं?वे अब भी चुप थे।जैसे मेरे सवालों का सही जवाब ढूढ़ रहे हो।

आखिर उन्होंने ने अपनी खामोशी तोड़ी।शर्मा जी,मैं अपने घर को बहुत,कहतें-कहतें उनकी आँखें भर आई।जीवन की इस संध्या को मैं अपने बच्चों के साथ अपने घर में बिताना चाहता था।नवीन जी,क्या ये सब हमारे हाथ में होता है?जीवन के इस आखिरी पड़ाव को खुशी से गुजर दे,यही जीवन हैं।इस आश्रम में कौन ऐसा हैं,जो अपनी मर्ज़ी से यहाँ आया है,सभी अपने जीवन के अन्तिम पलों को यादों के सहारे गुजार रहे हैं?फिर आप भी हमारा हिस्सा क्यों नहीं बन जाते?जीवन की संध्या में।

नवीन जी,ने मेरा हाथ कसकर पकड़ लिया। वह भी मेरे साथ, इस गोधूलि को निहार रहे थे।सभी के चेहरे चमक रहे थे।हम दोनों अपने धीमे होते कदमों से आश्रम की ओर बढ़ रहे थे, उधर पक्षी भी अपने घोसलों की ओर बढ़ रहे थे।धीमे-धीमे।


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